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आदि पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा |  ७५   क
न स जातु सुखं जीवेत्त्वय़ि क्रुद्धे परन्तप ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति