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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानाः प्रदीपाश्च रथवारणवाजिषु |  ३६   क
अदृश्यन्त महाराज महोल्का इव खाच्च्युताः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति