द्रोण पर्व  अध्याय १४४

सञ्जय़ उवाच

सा निशा भरतश्रेष्ठ प्रदीपैरवभासिता |  ३७   क
दिवसप्रतिमा राजन्वभूव रणमूर्धनि ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति