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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
आदित्येन यथा व्याप्तं तमो लोके प्रणश्यति |  ३८   क
तथा नष्टं तमो घोरं दीपैर्दीप्तैरलङ्कृतम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति