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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
स्वे स्वान्परे परांश्चापि निजघ्नुरितरेतरम् |  ४२   क
निर्मर्यादमभूद्युद्धं रात्रौ घोरं भय़ावहम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति