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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्ट्वा शत्रुं तथागतम् |  ८   क
ननाद शकुनी राजंस्तपान्ते जलदो यथा ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति