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आदि पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
सा चिन्तय़े सदा पुत्र व्राह्मणस्यास्य किं न्वहम् |  १३   क
प्रिय़ं कुर्यामिति गृहे यत्कुर्युरुषिताः सुखम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति