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आदि पर्व
अध्याय १४५
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व्राह्मण उवाच
अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम् |  २४   क
जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रय़ोगे महत्तरम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति