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आदि पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
रमणीय़ानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च |  ३   क
पार्थिवानपि चोद्देशान्सरितश्च सरांसि च ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति