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आदि पर्व
अध्याय १४५
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व्राह्मण उवाच
सहधर्मचरीं दान्तां नित्यं मातृसमां मम |  ३१   क
सखाय़ं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति