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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
मातरं चाविदूरस्थां शिष्यवत्प्रणतां स्थिताम् |  १७   क
कुन्तीं ददर्श धर्मात्मा सततं धर्मचारिणीम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति