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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे |  १५   क
प्रनष्टा ज्योतिषां भाश्च सह सूर्येण भारत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति