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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
जेपुश्च शतरुद्रीय़ं देवाः कृत्वाञ्जलिं ततः |  २१   क
संस्तूय़मानस्त्रिदशैः प्रससाद महेश्वरः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति