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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
असूय़तश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः |  ३१   क
सवज्रं स्तम्भय़ामास तं वाहुं परिघोपमम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति