अनुशासन पर्व  अध्याय १४५

वासुदेव उवाच

स चापि व्राह्मणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् |  ३५   क
द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत् ||  ३५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति