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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
न चैवोत्सहते स्थातुं कश्चिदग्रे महात्मनः |  ७   क
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति