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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
देशान्म्लेच्छगणाकीर्णान्नानारत्नाकराय़ुतान् |  १२   क
ददृशुर्गिरिपादांश्च नानाधातुसमाचितान् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति