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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधरगणाकीर्णान्युतान्वानरकिंनरैः |  १३   क
तथा किम्पुरुषैश्चैव गन्धर्वैश्च समन्ततः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति