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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते व्यतीत्य वहून्देशानुत्तरांश्च कुरूनपि |  १५   क
ददृशुर्विविधाश्चर्यं कैलासं पर्वतोत्तमम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति