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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
ददृशुस्तां च वदरीं वृत्तस्कन्धां मनोरमाम् |  १७   क
स्निग्धामविरलच्छाय़ां श्रिय़ा परमय़ा युताम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति