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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतां मृदुभिः शुभाम् |  १८   क
विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति