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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् |  १९   क
मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् |  १९   ख
मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति