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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् |  ३५   क
प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णय़ा ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति