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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवान्पितॄंश्चैव तर्पय़न्तः पुनः पुनः |  ४२   क
व्राह्मणैः सहिता वीरा न्यवसन्पुरुषर्षभाः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति