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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाय़ास्तत्र पश्यन्तः क्रीडितान्यमरप्रभाः |  ४३   क
विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति