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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहाय़सा |  ५   क
गच्छ नीचिकय़ा गत्या यथा चैनां न पीडय़ेः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति