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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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गृध्र उवाच
भ्रान्तजीवस्य वै वाष्पं कस्माद्धित्वा न गच्छथ |  ५६   क
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निरर्थश्च परिग्रहः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति