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उद्योग पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
सम्भाष्य सुचिरं कालं मन्त्रय़ित्वा पुनः पुनः |  २   क
स्वमेवावसथं शौरिर्विश्रामार्थं जगाम ह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति