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उद्योग पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
स्वर्यातेऽहं पितरि तं स्वराज्ये संन्यवेशय़म् |  २१   क
विचित्रवीर्यं राजानं भृत्यो भूत्वा ह्यधश्चरः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति