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वन पर्व
अध्याय २७४
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मातलिरु उवाच
तत्यजुस्तं महाभागं पञ्च भूतानि रावणम् |  ३०   क
भ्रंशितः सर्वलोकेषु स हि व्रह्मास्त्रतेजसा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति