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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनश्च विंशत्या शकुनिश्चापि पञ्चभिः |  १७   क
पाञ्चाल्यं त्वरिताविध्यन्सर्व एव महारथाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति