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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
द्रुमसेनस्तु सङ्क्रुद्धो राजन्विव्याध पत्रिणा |  २०   क
त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति