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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
स तु तं प्रतिविव्याध त्रिभिस्तीक्ष्णैरजिह्मगैः |  २१   क
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैः प्राणान्तकरणैर्युधि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति