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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
भल्लेनान्येन तु पुनः सुवर्णोज्ज्वलकुण्डलम् |  २२   क
उन्ममाथ शिरः काय़ाद्द्रुमसेनस्य वीर्यवान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति