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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा तु कर्णं संरव्धं ते वीराः षड्रथर्षभाः |  २७   क
पाञ्चाल्यपुत्रं त्वरिताः परिवव्रुर्जिघांसय़ा ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति