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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
स सात्यकेस्तु वलिनः कर्णस्य च महात्मनः |  ३२   क
आसीत्समागमो घोरो वलिवासवय़ोरिव ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति