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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
विपाठकर्णिनाराचैर्वत्सदन्तैः क्षुरैरपि |  ३५   क
कर्णः शरशतैश्चापि शैनेय़ं प्रत्यविध्यत ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति