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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां कर्णस्य चाभिभो |  ३८   क
अविध्यत्सात्यकिः क्रुद्धो वृषसेनं स्तनान्तरे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति