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वन पर्व
अध्याय २६
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मार्कण्डेय़ उवाच
महावलान्पर्वतकूटमात्रा; न्विषाणिनः पश्य गजान्नरेन्द्र |  १४   क
स्थितान्निदेशे नरवर्य धातु; र्नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति