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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
वातेनेव समुद्धूतमभ्रजालं विदीर्यते |  ४९   क
सव्यसाचिनमासाद्य भिन्ना नौरिव सागरे ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति