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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं यदि हन्यामो धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |  ५४   क
असंशय़ं महाराज ध्रुवो नो विजय़ो भवेत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति