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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
सव्यसाची पुरोऽभ्येति द्रोणानीकाय़ भारत |  ५६   क
संसक्तं सात्यकिं ज्ञात्वा वहुभिः कुरुपुङ्गवैः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति