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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छन्तु वहवः प्रवरा रथसत्तमाः |  ५७   क
यावत्पार्थो न जानाति सात्यकिं वहुभिर्वृतम् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति