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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
वृतः सहस्रैर्दशभिर्गजानामनिवर्तिनाम् |  ६०   क
रथैश्च दशसाहस्रैर्वृतो याहि धनञ्जय़म् ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति