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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
केचिद्भ्रान्तै रथैस्तूर्णं निहतपार्ष्णिय़न्तृभिः |  १२   क
विपताकध्वजच्छत्रैः पार्थिवाः शीर्णकूवरैः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति