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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
सर्वथा यत्पशून्पाति तैश्च यद्रमते पुनः |  १४   क
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात्पशुपतिः स्मृतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति