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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
तस्य घोराणि रूपाणि दीप्तानि च वहूनि च |  २१   क
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते विप्रास्तानि विदुर्वुधाः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति