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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
नामधेय़ानि वेदेषु वहून्यस्य यथार्थतः |  २२   क
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात्कर्मभिस्तथा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति