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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
प्रदाता सर्वलोकानां विश्वं चाप्युच्यते महत् |  २४   क
ज्येष्ठभूतं वदन्त्येनं व्राह्मणा ऋषय़ोऽपरे ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति