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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
स ददाति मनुष्येभ्यः स एवाक्षिपते पुनः |  २७   क
शक्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति